"Bhajan ki Mahima" "भजन की महिमा"

भजन की महिमा


यह हमारा स्वभाव है कि जब तक हमें किसी वस्तु की महिमा पता ना चले तब तक हम उधर आकर्षित नहीं होते हैं ।हमारा मनुष्य जीवन भजन के लिए ही मिला है कम से कम हम वह लोग जो अपने आपको वैष्णव कहते हैं उनका जीवन तो भजन भक्ति के लिए ही मिला है ।अब प्रश्न उठता है इस संसार में सभी लोग तो भजन नहीं कर रहे हैं कोई धन कमा रहा है कोई कामनाओं की पूर्ति में लगा हुआ है कोई भाग दौड़ में लगा हुआ है किसी के पास अकूत संपत्ति है किसी के पास अनेक पुत्र हैं आदि, आदि । लेकिन हम यदि ध्यान से देखें तो इनमे से किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर चमक नहीं है प्रसन्नता नहीं है आनंद नहीं है संतोष नहीं है और फल भी कुछ हाथ नहीं पड़ता पुत्र भी यहीं रह जाते हैं धन भी यहीं रह जाता है और रोता पीटता व्यक्ति चला जाता है

"Bhajan ki Mahima" "भजन की महिमा"

इसके विपरीत यदि हम सच्चे संत सच्चे भजन कारी वैष्णवों को देखें तो उनका परम धन है नाम उनका परम संतोष है भगवत भजन।उनके चेहरे पर एक चमक है और वह जब जाते हैं तो हंसते हुए जाते हैं उनका यहां पर न था न पड़ा रह जाता है।भजन किया भजन साथ जाता है और यदि थोड़ी हल्की बात भी करें तो

बड़े से बड़े धन वाला

अधिक से अधिक पुत्रोंवाला

अधिक से अधिक यश वाला

अधिक से अधिक मानवाला

सारे के सारे आकर इन भजन आनंदी संतो के चरणों में शीश नवाते हैं ।आखिर क्यों । क्योंकि भजन भक्ति वैष्णवता संत यह सर्वोपरि है और सर्वोपरि इसलिए है कि उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य समझा और उसमें लग गये ।उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया इसीलिए हम सब इनके चरणों में शीश नवाते हैं हम भी प्रयास करें संसार के साथ-साथ संसार में अनासक्त रहते हुए अपने परम लक्ष्य भगवत भजन पर केंद्रित करें ।हम कर सकते हैं अनेकों ने किया है तो आप और मैं क्यों नहीं ?


समस्त वैष्णव वृंद को दासाभास का प्रणाम ।

।। जय श्री राधे ।।

।। जय निताई ।। लेखक दासाभास डॉ गिरिराज

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