"Aacharan ya aadesh" "आचरण या आदेश"

आचरण या आदेश


शास्त्रों एवं ग्रंथों में अनेकोंनेक सन्तों वैष्णवों गोस्वामिपाद जन के चरित्र आदि हम प्राय:अध्ययन करते रहे हैं पढ़ते हैं । ऐसे महात्मा जनों के जीवन के बहुत से प्रसंग प्रचलित हो जाते हैं । हम उनको सुनाते भी हैं सुनते भी है।पहली बात तो यह है महत् जनों का आदेश पालन करना चाहिये। उनके आचरण का अनुकरण नहीं करना चाहिये।उन्होंने जो किया वह 10 बार 50 बार सोच कर समझ कर अपनी औकात देख कर हिम्मत हो तो करो नहीं तो ना करो ।लेकिन उन्होंने जो कहा-आँख बंद करके करो । करने में विद्ववतजनों ।गोस्वामी पाद के चरित्रों में अनेक पक्ष होते हैं । एक होता है उपासना पक्ष। जैसे श्री सनातन गोस्वामी अधपकी की बिना नमक की बाटी मदनमोहन को भोग देते थे। ठाकुर में नमक मांगा तो कह- दिया आज नमक कल चीनी।मैं तुम्हारे लिए नमक चीनी की व्यवस्था करूँ या भजन करूँ ।अस्तु बाद में श्री रामदास कपूर नामक सेवक से सब व्यवस्था उन्होंने करवा ली। अलग प्रसंग है । सब जानते हैं।तो सनातन गोस्वामी ने ठाकुर को नमक के लिए मना किया तो हम भी सूखी रूखी रोटी ठाकुर को भोग में लगायें ; श्री सनातन गोस्वामी लगाते थे कि नही ठाकुर उन पर रीझे थे की नहीं। ऐसे ही अन्य अनेक उपासना विषयक बातें हम पकड़ लेते हैं ।जो कि नहीं पकड़ने चाहिये । इसमें समस्त प्रश्नों का एक ही जवाब है -जब सनातन गोस्वामी जैसी स्थिति में आ जाओ तब रूखा सुखा भोग लगा देना ।चलेगा हमें ऐसे ही अन्य संतों के अनेक उदाहरण दिखते हैं ।उन पर हमारा ध्यान जाता है।

"Aacharan ya aadesh" "आचरण या आदेश"

लेकिन श्री सनातन का नया कम्बल देकर पुराना कम्बल लेकर उसे प्रयोग करना इस बात पर ध्यान नहीं जाता ।प्रतिदिन श्री गिरिराज की परिक्रमा करना अशक्त होने पर भी गिरते -पड़ते ,इस पर ध्यान नहीं जाता ।प्रतिदिन गोपेश्वर के दर्शन करने जाने पर ध्यान नहीं जाता। दिग्विजयी को एक क्षण में विजय पत्र लिख देने पर ध्यान नहीं जाता। एक राज्य के मंत्री पद को उन्होंने कैसे त्यागा कितने वैराग्य पूर्वक भजन किया ।कितने ग्रंथों का प्रणयन किया। आज हम एक सौ पृष्ठ का ग्रन्थ छापते है तो अपना जवानी का चित्र । शिक्षा । को कुल आदि का परिचय प्रमुखता से छापते हैं ।और श्री रुप ,सनातन श्री जीव आदि ने सैकड़ों ग्रंथ लिखे। कही भी एक तो लाइन में भी अपनी भक्ति पूर्ण जीवन का वृत्तांत नहीं लिखा जो भी विवरण प्राप्त होता है अन्य लेखकों द्वारा प्राप्त होता है। अतः सर्वप्रथम तो उनके आदशों का पालन करने में ध्यान दें।वही सार का सार है। फिर भी यह देखना है यह तो उनके भजन -साधन- नियम की द्रढता पर ध्यान दें ।उनके उपासना पक्ष को तो देखने की हमारी स्थिति नहीं है ।वैसा करना तो हम तो हम सोच से परे की बात है। हमें तिलक लगाने में कण्ठी धारण करने में शर्म आती है ।और अनुकरण करते हैं तुलसीदास जी का या श्री सनातन गोस्वामी पाद का। ठीक है टारगैटी ऊँचा रखो जिससे कि गिरो तो जमीन पर नहीं पहाड़ पर गिरो।लेकिन थोड़ा आत्म निरीक्षण कर लो कि हम कितने पानी में हैं।हम जमीन पर गिरना तो क्या खड़े होने की भी स्थिति में है क्या? अतः छोटी-छोटी बातों ।वैष्णव आचरण। तिलक। कंठी। माला। नाम। गुरु।नामपाराध।भक्ति विकाश क्रम।श्रद्धा।साधुसंग। भजनक्रिया।अनर्थ।रूचि।निष्ठा। आसक्ति आदि को समझें।अनुभव करें। फिर प्रेम एवं भाव एवं निकुंज-सेवा की बात करें तो द्रण्डता आयेगी। कुछ मिलने जैसा अनुभव होगा। अन्यथा तो बातें है बातों का क्या?

समस्त वैष्णव वृंद को दासाभास का प्रणाम ।

।। जय श्री राधे ।।

।। जय निताई ।। लेखक दासाभास डॉ गिरिराज

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